अल्फ्रेडो ओरियानी का उपन्यास “Olocausto” 20वीं सदी के आरंभ में लिखा गया था। इसकी कथा मानवीय भावनाओं और सामाजिक संघर्षों की जटिलताओं का अन्वेषण करती है तथा गरीबी, प्रेम और नैतिक दुविधाओं से जूझते पात्रों पर केंद्रित है। आरंभिक दृश्य में एक ऐसे युवक का परिचय मिलता है, जिसने अपने कारोबारी लेन-देन में सफलता का अनुभव किया है और विद्यार्थियों तथा प्रांतीय परिवारों से भरे एक व्यस्त कैफ़े के वातावरण में विचरण करता है। यह सामाजिक वर्गों के उस अंतर की ओर संकेत करता है, जो कहानी में आगे और उभरकर सामने आएगा। पुस्तक की शुरुआत में हम आत्मविश्वास से भरे एक युवक से मिलते हैं, जो अपने साधारण अतीत को याद करते हुए अपने आसपास के लोगों का जीवन देखता है। भरपेट भोजन के बाद उसे अपने वर्तमान जीवन की नीरसता पर प्रश्न उठने लगते हैं और वह फ्लोरेंस की गलियों में भटकने का निर्णय करता है। एक रहस्यमयी स्त्री से उसकी भेंट उसे एक साधारण-से घर तक ले जाती है, जहाँ उसकी मुलाकात टीना नामक एक नाज़ुक लड़की से होती है, जो अपनी बीमार माँ के साथ अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में रह रही है। यह मार्मिक परिचय जीवन की कठोरता के बीच निराशा और मानवीय जुड़ाव के विषयों के अन्वेषण की भूमिका तैयार करता है और पात्रों द्वारा झेले जा रहे भावनात्मक उथल-पुथल की एक प्रभावशाली झलक प्रस्तुत करता है।