जॉन टिंडल की “ध्वनि” 19वीं सदी के उत्तरार्ध में लिखी गई एक वैज्ञानिक कृति है। यह पुस्तक ध्वनिविज्ञान के सिद्धांतों और घटनाओं में गहराई से जाती है तथा ध्वनि के प्रसार, ध्वनि तरंगों के भौतिकी और विभिन्न माध्यमों के साथ ध्वनि की अंतःक्रिया जैसे विषयों का अन्वेषण करती है। इसका उद्देश्य विज्ञान के बारे में जनसाधारण के ज्ञान को बढ़ाना है, विशेष रूप से ध्वनि की प्रकृति पर ध्यान केंद्रित करते हुए। “ध्वनि” का आरंभ पाठक को ध्वनिविज्ञान की मूलभूत अवधारणाओं से परिचित कराता है और ध्वनि को ग्रहण करने में तंत्रिका-संचरण के महत्व पर बल देता है। टिंडल बताते हैं कि ध्वनि कैसे उत्पन्न और प्रसारित होती है तथा निर्वात और विभिन्न गैसों सहित विविध परिस्थितियों में ध्वनि तरंगों के व्यवहार को दर्शाने के लिए प्रयोगों का उपयोग करते हैं। वे ध्वनि-संचरण में वायु की भूमिका तथा ध्वनि की विशेषताओं पर तापमान और दाब के प्रभाव पर चर्चा करते हैं, जिससे पूरी पुस्तक में ध्वनि-विज्ञान के गहनतर अन्वेषण की भूमिका तैयार होती है।