ऑगस्टस डी मॉर्गन की “A Budget of Paradoxes, Volume II” 19वीं शताब्दी के मध्य में लिखी गई एक दार्शनिक और गणितीय कृति है। यह खंड गणितीय तर्क और दार्शनिक तर्कों में पाए जाने वाले विभिन्न विरोधाभासों और भ्रांतियों का अन्वेषण तथा आलोचना जारी रखता है और विशेष रूप से लैप्लास और ऑयलर जैसे विख्यात व्यक्तियों के कार्यों और विचारों पर केंद्रित है। डी मॉर्गन हास्य और कठोर विश्लेषण का अनूठा संयोजन प्रस्तुत करते हैं तथा दर्शन में नास्तिकता से लेकर खगोलीय सिद्धांतों की जटिलताओं तक के विषयों पर चर्चा करते हैं। खंड का आरंभ दार्शनिक नास्तिकता की चर्चा से होता है, जिसमें लैप्लास और ऑयलर जैसे प्रमुख ऐतिहासिक व्यक्तियों से जुड़े प्रसंगों का उपयोग विश्वास और तर्क के बीच तनाव को स्पष्ट करने के लिए किया गया है। डी मॉर्गन दार्शनिक विमर्श में देवताओं को परिकल्पनाओं के रूप में देखने की प्रकृति पर सूझबूझ भरी टिप्पणियाँ करते हैं और स्थापित वैज्ञानिक समझ को चुनौती देने वाले आधुनिक विरोधाभासवादियों के दृष्टिकोणों की आलोचना करते हैं। विनोदी कथन-शैली के माध्यम से वे बेतुके गणितीय तर्कों की आलोचना प्रस्तुत करते हैं और ऐसे प्रश्नों के जरिए पाठकों को जोड़ते हैं, जो उनके तार्किक विवेक तथा विज्ञान और विश्वास की समझ—दोनों को चुनौती देते हैं।