फ्रांसिस ई. हॉवर्ड की “द चाइल्ड-वॉइस इन सिंगिंग” 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लिखी गई स्वर-प्रशिक्षण संबंधी मार्गदर्शिका है। यह पुस्तक बच्चों की गायन-आवाज़ों के शारीरिक पहलुओं पर केंद्रित है और विशेष रूप से विद्यालयों तथा बाल-गायकवृंदों के लिए तैयार की गई अंतर्दृष्टियाँ और शिक्षण-पद्धतियाँ प्रस्तुत करती है। हॉवर्ड का उद्देश्य बच्चों में उचित स्वर-तकनीक के लिए वैज्ञानिक आधार स्थापित करना है। वे कोमल स्वर में गाने और हेड-वॉइस के उचित उपयोग की वकालत करते हैं। रचना का आरंभ एक ऐसी प्रस्तावना से होता है, जिसमें इस आम भ्रांति पर बल दिया गया है कि बच्चों की आवाज़ें स्वभावतः खुरदरी और कर्कश होती हैं। हॉवर्ड इस धारणा का खंडन करते हुए कहते हैं कि यदि बच्चों की आवाज़ों को उचित ढंग से साधा जाए, तो उन्हें कोमल और सुंदर स्वर उत्पन्न करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। वे बच्चों और वयस्कों की आवाज़ों के बीच शारीरिक अंतर पर चर्चा करते हैं और आगे आने वाले अध्यायों की भूमिका तैयार करते हैं, जिनमें गायन की यांत्रिकी का विशद विवेचन तथा शिक्षकों के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया जाएगा। कुल मिलाकर, प्रारंभिक भाग बाल्यावस्था में उचित स्वर-प्रशिक्षण के महत्त्व का सशक्त परिचय प्रस्तुत करता है और इस कृति के प्रति लेखक की विशेषज्ञता तथा उद्देश्यों को स्पष्ट करता है।