चार्ल्स वैग्नर की «सरल जीवन» 19वीं सदी के उत्तरार्ध में लिखी गई एक दार्शनिक कृति है। यह रचना मुख्यतः आधुनिक जीवन की जटिलताओं और भौतिक अतिरेक के विपरीत एक सरल, अधिक सार्थक अस्तित्व अपनाने के विषय की पड़ताल करती है। इसमें सामाजिक दबावों से उत्पन्न असंतोष पर विचार किया गया है और पाठकों को सादगी, सद्गुण तथा सच्चे मानवीय संबंधों पर आधारित जीवन जीने के लिए प्रेरित किया गया है। पाठ की शुरुआत विवाह की तैयारियों के दौरान ब्लांशार परिवार के अराजक जीवन का परिचय देती है और दिखाती है कि उनका जीवन किस प्रकार तुच्छताओं तथा सामाजिक दायित्वों से भर गया है। इस उन्माद के बीच दादी अपनी बुद्धिमत्ता साझा करती हैं और संकेत देती हैं कि लगातार व्यस्त रहने से उन बातों से ध्यान हट जाता है जो वास्तव में मायने रखती हैं—संबंध और व्यक्तिगत जुड़ाव। इसके बाद वैग्नर इस कथा का विस्तार करते हुए जोर देते हैं कि आधुनिक जीवन कृत्रिम आवश्यकताओं और जटिलताओं में वृद्धि से चिह्नित है, जो अक्सर असंतोष और नैतिक पतन की ओर ले जाती हैं। उनका मत है कि सच्चा सुख और संतुष्टि अपनी इच्छाओं को सरल बनाने तथा आवश्यक मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करने से उत्पन्न होती है। यह आरंभ पूरी रचना में इन विचारों की व्यापक पड़ताल की आधारभूमि तैयार करता है।