"Der Ewige Jude" अगस्त वर्माइलेन का ऐतिहासिक उपन्यास है, जो बीसवीं शताब्दी के आरंभ में लिखा गया। कथा का केंद्र अहश्वेरस है, यरूशलेम का एक मोची, जिसका जन्मदिन मसीह के साथ साझा है और जो निराशा, उद्देश्य तथा पीड़ा व अन्याय से भरी दुनिया में अर्थ की खोज से जूझता है। जैसे-जैसे वह अपने अस्तित्व की उथल-पुथल से गुजरता है, वह यीशु की शिक्षाओं में क्रमशः और अधिक डूबता जाता है; वे उसके भीतर आशा और दृढ़ संकल्प की एक चिंगारी जगाती हैं, फिर भी उसे विश्वास और संदेह के संघर्ष में ले जाती हैं। पुस्तक के आरंभ में हम अहश्वेरस से मिलते हैं, एक उदास व्यक्ति जो नीरस अस्तित्व में फँसा है और अंधकार में मेहनत करते हुए मानव जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना करने को बाध्य है। मोची के रूप में कड़ी मेहनत के बावजूद वह परित्यक्त महसूस करता है और जीवन के संघर्षों के बोझ से घुटता है, दूसरों की पीड़ा देखता है पर स्वयं को सांत्वना नहीं मिलती। उसकी आंतरिक उथल-पुथल तब भड़कती है जब वह यीशु से मिलता है, जिनकी क्रांतिकारी शिक्षाएँ उसके भीतर प्रशंसा और संदेह का अराजक मिश्रण जगा देती हैं। जैसे-जैसे अहश्वेरस यीशु की शिक्षाओं और आसन्न नियति से जुड़े घटनाक्रम में और उलझता जाता है, वह एक गहरे अस्तित्वगत तड़प का खिंचाव महसूस करता है, जो मानव इच्छा, निराशा और उद्धार की खोज की गहन पड़ताल का मंच तैयार करता है।