जीन द ला ब्रेत की 《Mi tío y mi cura》 20वीं सदी के आरंभ में लिखा गया एक उपन्यास है। कहानी रैना नाम की एक युवा लड़की के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती प्रतीत होती है, जो अपने कठोर स्वभाव वाली बुआ और दयालु गाँव के पादरी के शासन वाले कठिन घरेलू वातावरण में बड़ी हो रही है। बचपन से गुजरते हुए रैना अधिकार, शिक्षा और अपनी उभरती स्वतंत्रता जैसे विषयों से जूझती है, साथ ही अपनी बुद्धिमत्ता और किशोर विद्रोही स्वभाव का परिचय देती है। उपन्यास की शुरुआत में हमारा परिचय रैना से होता है, जो स्वयं को काफ़ी छोटी बताती है। इससे उसके आत्म-रूप और अपनी लंबी, अप्रिय बुआ के साथ संबंध को लेकर उसका संघर्ष सामने आता है। अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद रैना को उसकी बुआ अपने घर ले आती है, जो केवल आर्थिक लाभ के लिए उसका पालन-पोषण करने को तैयार होती है। आरंभिक भाग एक हल्का-फुल्का किंतु मार्मिक स्वर स्थापित करता है और रैना के शरारती व्यक्तित्व, उसे शिक्षा देने वाले पादरी के साथ उसके विवादपूर्ण किंतु स्नेहपूर्ण संबंध तथा अपनी बुआ के दमनकारी अधिकार के विरुद्ध उसके मौन विद्रोह को उजागर करता है। इस प्रकार विकास, आत्म-अन्वेषण और व्यक्तित्व तथा सामाजिक अपेक्षाओं के बीच तनाव की कथा के लिए मंच तैयार होता है।