मैक्स बाउर की कृति "Der deutsche Durst: Methyologische Skizzen der deutschen Kulturgeschichte" बीसवीं शताब्दी के आरंभ में लिखी गई एक सांस्कृतिक इतिहास है। यह ग्रंथ जर्मनी में मद्यपान संस्कृति के विविध पक्षों का अन्वेषण करता है तथा जर्मन समाज में मीड, बीयर और वाइन जैसे पेयों के ऐतिहासिक रीति-रिवाजों तथा महत्व में गहराई से उतरता है। पाठ का उद्देश्य सामान्य पाठक का मनोरंजन और ज्ञानवर्धन करना है तथा यह बताना है कि युगों-युगों में इन पेयों ने सामाजिक अनुष्ठानों और सामुदायिक सभाओं को कैसे आकार दिया। पुस्तक का आरंभ मानव संस्कृति में पीने के मूलभूत महत्व पर चर्चा करता है तथा सुझाता है कि पीने का कर्म एक प्राथमिक मानवीय अनुभव है, जिसे खाने जैसे अन्य कौशलों से पहले सीखा जाता है। लेखक इस बात पर बल देता है कि मद्यपान, विशेषकर सामूहिक परिवेश में, संबंधों और सामाजिक संरचनाओं को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है, जैसा प्राचीन जर्मनिक सभाओं के जीवंत चित्रणों में दिखाई देता है जहाँ मीड पिया जाता था। आख्यान सौहार्द, परंपरा तथा उत्सवी मद्यपान और मानव व्यवहार के अंधकारमय पक्षों के बीच अंतःक्रिया के विषयों का परिचय देता है तथा इतिहास भर में जर्मन मद्यपान रीतियों के परीक्षण की भूमिका तैयार करता है।