Jewett C. Gilson की "Wealth of the World's Waste Places and Oceania" 20वीं सदी के आरंभ में लिखा गया एक भौगोलिक ग्रंथ है। यह पाठ इस विचार का अन्वेषण करता है कि पारंपरिक मानकों के अनुसार "व्यर्थ" या "अनुत्पादक" माने जाने वाले क्षेत्रों में वास्तव में पर्याप्त छिपी हुई संपदा होती है, जो मानव सभ्यता के कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेखक विश्व भर के विभिन्न स्थानों का विशद अध्ययन करते हुए अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी में उनके विशिष्ट योगदानों को उजागर करता है और इस प्रकार प्रकृति में व्यर्थता की धारणा को चुनौती देता है। रचना का आरंभ इस अवधारणा से होता है कि जो भूमि अनुत्पादक या बंजर दिखाई दे सकती है, वह वास्तव में पृथ्वी पर जीवन के संतुलन के लिए आवश्यक है। Gilson बताते हैं कि मरुस्थल और ध्रुवीय क्षेत्र जैसे प्रदेश महत्वपूर्ण पारिस्थितिक कार्य करते हैं तथा मीठे पानी और आवश्यक खनिजों जैसे संसाधनों का योगदान देते हैं, जो अन्य अधिक उर्वर भूमियों को सहारा देते हैं। उनका तर्क है कि भले ही कुछ क्षेत्र प्रत्यक्ष कृषि लाभ न देते हों, फिर भी उनकी भूवैज्ञानिक और जलवायवीय विशेषताएँ वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाती हैं। यह गहन विवेचन आगे के अध्यायों में विशिष्ट "व्यर्थ प्रदेशों" की विस्तृत जाँच के लिए आधार तैयार करता है और उनकी उन संभावनाओं तथा जटिलताओं को उजागर करता है, जिन्हें प्रायः अनदेखा किया गया है।