लुइस मारियानो दे लारा का उपन्यास «Si yo fuera rico!» 19वीं सदी के उत्तरार्ध में लिखा गया था। कहानी अपने पात्रों के जीवन के माध्यम से धन, महत्वाकांक्षा और मानवीय संबंधों जैसे विषयों की पड़ताल करती है। इसका विशेष ध्यान बर्नार्दा बोनेट पर है, जो अपनी अधूरी इच्छाओं और धन तथा विवाह से जुड़े सामाजिक ढाँचों से जूझती एक कटु हो चुकी महिला है। उपन्यास की शुरुआत में हमारा परिचय दोना बर्नार्दा से होता है, जो अपने भाई बेनितो के साथ रहने वाली अधेड़ महिला है और अविवाहित होने की अपनी स्थिति के कारण मन में कटुता संजोए हुए है। कथा उसके आंतरिक संघर्षों को उजागर करती है, जो विशेष रूप से उसके भाई के संपन्न मित्र हुआन पुइग के प्रति उसकी भावनाओं से जुड़े हैं। हुआन को अप्रत्याशित रूप से लाभदायक कपड़े का कारोबार विरासत में मिल जाता है। पुइग की अचानक प्राप्त संपत्ति और अपने समझे हुए नुकसान से बर्नार्दा जिस तरह जूझती है, उससे पारिवारिक निष्ठा, एकतरफ़ा प्रेम और तेजी से बदलते समाज में वर्गगत तनावों से जुड़े नाटकीय घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि तैयार होती है। आरंभिक अंश बारीकी से उन संघर्षों का संकेत देता है, जो इस घनिष्ठ दायरे में तब उभरेंगे जब नई-नई प्राप्त संपत्ति की पृष्ठभूमि में अलग-अलग आकांक्षाएँ टकराएँगी।