एमिलियो रागा की "I drammi de' campi" 19वीं सदी के उत्तरार्ध में लिखा गया एक उपन्यास है। कहानी ग्रामीण सिसिली की पृष्ठभूमि में आगे बढ़ती है और नैतिकता, पारिवारिक निष्ठा तथा गाँव के जीवन की सामाजिक गतिशीलता जैसे विषयों का अन्वेषण करती है। कथा के केंद्र में पेप्पे नामक एक शरारती बालक है, जिसकी करतूतें और चोरी की ओर उसके शुरुआती झुकाव उसके दादा सावेरियो तथा स्थानीय पादरी डॉन फ्रांसेस्को का ध्यान आकर्षित करते हैं; इससे उसके स्वाभाविक शरारतीपन और परिवार में ईमानदार आचरण की अपेक्षाओं के बीच का संघर्ष उभरकर आता है। कहानी की शुरुआत में हमारा परिचय पेप्पे से होता है, जिसे उसका कठोर दादा सावेरियो अक्सर डाँटता है और जो नैतिकता के प्रति अपने असंतोष पर विचार करता रहता है। पेप्पे में ईसाई मूल्यों का संचार करने के सावेरियो के प्रयासों का लड़का विद्रोह के साथ प्रत्युत्तर देता है, जिससे वह चोरी की राह पर बढ़ता जाता है और अंततः अपने साथियों के साथ छोटी-मोटी चोरियों की एक शृंखला में शामिल हो जाता है। आरंभिक अध्यायों के आगे बढ़ने पर पेप्पे की करतूतों से जुड़ा उभरता संकट तब गंभीर हो जाता है, जब वह नाशपाती चुराते हुए पकड़ा जाता है और इसके बाद अपने मित्र कास्त्रेन्ज़े के साथ अधिक गंभीर चोरियों में लिप्त होता है। इससे प्रलोभन तथा युवाओं का मार्गदर्शन करने में वृद्ध पीढ़ी के सामने आने वाली कठिनाइयों के विषय उजागर होते हैं। यह आख्यान सिसिली के गाँव के जीवन में परंपरा और आधुनिकता के बीच तनाव को समझने का एक माध्यम प्रस्तुत करता है।