Fundamental Principles of the Metaphysic of Morals

Kant, Immanuel, 1724-1804

इस किताब के बारे में

इमैनुएल कांत द्वारा लिखित “नैतिक दर्शन के मौलिक सिद्धांत” एक दार्शनिक ग्रंथ है, जो 18वीं शताब्दी के अंत में लिखा गया। यह ग्रंथ आधुनिक नैतिक सिद्धांतों की नींव रखता है, एवं विशेष रूप से नैतिक दर्शन की मूलभूत अवधारणाओं एवं कर्तव्यों की प्रकृति पर चर्चा करता है। कांत ने “अच्छी इच्छा”, “नैतिक कर्तव्य” एवं ऐसे नैतिक नियमों की रचना पर विस्तार से विचार किया, जो व्यक्तिगत प्रवृत्तियों से परे हों; साथ ही, तर्कसंगत सिद्धांतों पर आधारित नैतिकता की एक व्यवस्था प्रस्तुत की। पुस्तक की शुरुआत में ही कांत ने दर्शन की विभिन्न शाखाओं के बीच के अंतरों पर चर्चा की, एवं इस बात पर जोर दिया कि ऐसा नैतिक दर्शन आवश्यक है जो अनुभवजन्य प्रभावों से स्वतंत्र हो। उनका मानना था कि सच्चे नैतिक कार्य केवल तर्कसंगतता पर आधारित कर्तव्य-भावना से ही संभव हैं; न कि स्वार्थ या भावनात्मक प्रवृत्तियों से। कांत ने “श्रेणीबद्ध आदेश” (Categorical Imperative) की अवधारणा प्रस्तुत की; जिसे उन्होंने ऐसे सार्वभौमिक नैतिक नियम के रूप में परिभाषित किया, जो तर्कसंगत व्यक्तियों को उनके निर्णय लेने में मार्गदर्शन कर सके। इस पुस्तक में दी गई मूलभूत अवधारणाएँ यह दर्शाती हैं कि नैतिक मूल्य कार्यों के परिणामों से नहीं, बल्कि कर्तव्य-भावना एवं तर्कसंगतता से ही उत्पन्न होता है; क्योंकि ऐसी प्रेरणाएँ ही तर्कसंगत व्यक्तियों की अंतर्निहित मूल्यता का सम्मान करती हैं।

लेखक
Kant, Immanuel, 1724-1804
पढ़ने का स्तर
C1 · उन्नत
भाषा
English

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