अल्फ्रेड डेलवो द्वारा रचित “डिक्शननेयर द ला लांग वर्त” उन्नीसवीं सदी के मध्य में लिखा गया एक शब्दकोश है। यह कृति पेरिस की समृद्ध और विविध कठबोलियों का अन्वेषण करती है तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों, विशेषकर शहरी और श्रमिक वर्ग के निवासियों द्वारा प्रयुक्त अभिव्यक्तियों और पारिभाषिक शब्दावली का सूक्ष्मता से संकलन करती है। भाषावैज्ञानिक विश्लेषण और सांस्कृतिक अवलोकनों के समन्वय से यह शब्दकोश उस काल में पेरिस की गलियों की विशिष्ट जीवंत भाषा-परंपरा का दस्तावेजीकरण करना चाहता है। पुस्तक की भूमिका में भाषा के अध्ययन के महत्व और समाज के साथ उसके जटिल संबंध पर लेखक के विचार प्रस्तुत किए गए हैं। डेलवो कई वर्षों तक विभिन्न अभिव्यक्तियों को संकलित करने में मिलने वाले आनंद का वर्णन करते हैं और अपनी खोज की तुलना तितलियों का शिकार करने से करते हैं। वे रोजमर्रा की पेरिसवासियों की बातचीत में प्रयुक्त कठबोली या “हरी भाषा” की समृद्धि पर बल देते हैं और इसकी तुलना अकादेमी द्वारा समर्थित औपचारिक भाषा से करते हैं। इस प्रकार अनेक शब्दों और वाक्यांशों के व्यापक विश्लेषण की भूमिका तैयार होती है, जो भाषाई नवाचार और उस समय की सामाजिक गतिशीलता—दोनों की अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।